रिपोर्ट - उमेश कांत गिरि | घाटशिला, झारखंड
घाटशिला प्रखंड की विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। प्रखंड मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर भादवा गांव में रहने वाली विलुप्तप्राय आदिम जनजाति “बिरहोर” आज भी बदहाली, अधूरे वादों और सरकारी लापरवाही के बीच जिंदगी गुजारने को मजबूर है। जिस प्रधानमंत्री आवास योजना से इन्हें सम्मानजनक जीवन की उम्मीद थी, वही योजना अब इनके लिए अधूरे सपनों और पीड़ा की कहानी बन चुकी है।
गांव में कुल 13 प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत हुए, लेकिन उनमें से केवल 5 ही किसी तरह पूरे हो पाए हैं। बाकी 8 आवास अधूरे पड़े हैं—कहीं सिर्फ छत की ढलाई हुई है, तो कहीं दीवारें बिना प्लास्टर के खड़ी हैं। न खिड़की, न दरवाजे, न फर्श—इन अधूरे घरों में रहना किसी सजा से कम नहीं। कुछ परिवार मजबूरी में इनमें रहने लगे हैं, लेकिन बारिश होते ही छत से पानी टपकने लगता है और उन्हें घर के अंदर ही छाता लेकर बैठना पड़ता है। यह दृश्य न सिर्फ प्रशासनिक विफलता का प्रमाण है, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।

सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि एक बिरहोर दंपति, रुहिदास बिरहोर और उनकी पत्नी, अपने अधूरे घर को पूरा होते देखने की आस में ही इस दुनिया से चले गए। उनकी इकलौती बेटी बॉबी बिरहोर आज भी उसी अधूरे घर की ओर टकटकी लगाए बैठी है। यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की टूटी उम्मीदों का आईना है।
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उनके बैंक खातों में करीब 1.30 लाख रुपये की राशि आई थी, जिसे उन्होंने बिचौलिये नरेन मुर्मू को दे दिया। इसके बावजूद निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया गया। जब भी उनसे काम पूरा करने की बात की जाती है, तो वह घाटे का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। हैरानी की बात यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है, जिससे राजनीतिक संरक्षण की आशंका भी जताई जा रही है।

इसी गांव में तीन अन्य आवास, जिन्हें स्थानीय स्तर पर बनाया गया, पूरी तरह तैयार हैं और उनमें लोग रह भी रहे हैं। इससे साफ है कि समस्या योजना में नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन और निगरानी में है। सवाल यह उठता है कि जब कुछ घर बन सकते हैं, तो बाकी क्यों नहीं?
स्थिति की भयावहता यहीं खत्म नहीं होती। करीब 30 परिवारों की इस बस्ती में एक भी शौचालय की सुविधा नहीं है। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग आज भी खुले में शौच के लिए मजबूर हैं, जहां सांप-बिच्छू जैसे खतरों का डर हर वक्त बना रहता है। सरकार की “स्वच्छता” और “सभी के लिए आवास” जैसी योजनाएं यहां सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आती हैं।
ग्रामीणों को स्थानीय विधायक सोमेश चंद्र सोरेन से उम्मीद है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप कर न्याय दिलाएंगे। वहीं पंचायत स्तर पर भी जानकारी होने के बावजूद ठोस कार्रवाई का अभाव कई सवाल खड़े करता है।
यह पूरा मामला सिर्फ एक गांव या कुछ अधूरे मकानों का नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की पोल खोलता है जो कागजों में विकास के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन जमीनी हकीकत में असहाय और लाचार नजर आता है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं का यह हाल अगर देश की सबसे कमजोर और विलुप्त होती जनजातियों के साथ हो रहा है, तो यह चिंता का विषय ही नहीं, बल्कि गंभीर चेतावनी भी है।

बिरहोर जनजाति, जो पहले ही अस्तित्व के संकट से जूझ रही है, अब सरकारी उदासीनता और भ्रष्ट तंत्र के कारण और भी हाशिए पर धकेली जा रही है। सवाल यह है कि क्या इनकी आवाज कभी सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी, या फिर ये अधूरे घरों की तरह ही अधूरी उम्मीदों के साथ गुमनामी में खो जाएंगे…?











