लेखक - रचना मिश्रा पांडे
भारत में भिक्षावृत्ति--:
सरकार द्वारा देश में कई योजनाएं चलाई जा रही हैं ,जिसमें गरीबी उन्मूलन भी एक महत्वपूर्ण योजना है। लेकिन अक्सर सड़कों ,मंदिरों, और चौराहों पर भीख मांगते हुए भिखारी दिख जाते हैं ।जो भारत सरकार द्वारा लगातार किए जा रहे गरीबी उन्मूलन कार्यों को चुनौती देते हुए दिखाई पड़ते हैं।
हालांकि समय-समय पर भिक्षावृत्ति के निवारण हेतु कानून भी बनते आए हैं ,सर्वप्रथम "बॉम्बे भिक्षावृत्ति निवारण अधिनियम 1959" यह सबसे महत्वपूर्ण कानून है ,जिसे बाद में कई राज्यों जैसे दिल्ली ,उत्तर प्रदेश ,बिहार आदि ने भी अपनाया। इसके अंतर्गत भीख मांगना अपराध है ,और पुलिस भिक्षुक को कभी भी पकड़ सकती हैं ,तथा अदालत भिक्षुक को भिक्षुक गृह में भेज सकती है।किंतु भिक्षुकों की पुनर्वास की व्यवस्था काफी कमजोर होने की वजह से इस कानून का पालन बहुत कड़ाई से नहीं किया जा सका।
फिर 2018 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए कहा कि, भीख मांगना अपराध नहीं हो सकता। गरीबी के कारण भीख मांगने वालों को अपराधी घोषित करना गलत है। और इसके बाद दिल्ली में "बॉम्बे भिक्षावृत्ति निवारण अधिनियम 1959 "के कई प्रावधानों को अवैध घोषित कर दिया गया। और बात भी सही है, गरीबी या मानसिक- शारीरिक विकलांगता की स्थिति में भीख मांगना कोई अपराध नहीं बल्कि एक परिस्थिति है। आवश्यक है उसके पुनर्वास की व्यवस्था को मजबूत करने की ना कि उन्हें अपराधी घोषित करने की।
भिक्षावृत्ति के कई कारण हो सकते हैं,
- जहां एक और गरीबी बेरोजगारी तथा मानसिक -शारीरिक विकलांगता भिक्षावृत्ति के कारण हैं, वहीं दूसरी ओर भिक्षावृत्ति एक आदत बनी हुई होती है ।इन लोगों को अच्छी तरह से पता होता है कि कैसे और कहांँ अच्छी खासी भिक्षा मिल जाएगी। जैसे धर्म के नाम पर मंदिरों ,मस्जि़दों गुरुद्वारे के पास अच्छी खासी भिक्षा लोग दे देते हैं ।भिक्षा मांग कर ये लोग अपना भरण पोषण आसानी से कर लेते हैं, और काम करने के प्रति रुचि नहीं लेते ,जो बिल्कुल अनुचित है। ऐसे लोग हमारे समाज के लिए बोझ हैं। इन सब कारणों के अलावा ऐसा भी होता है कहीं भिखारियों का संगठित गिरोह काम कर रहा होता है, जो कि अपराध की श्रेणी में है।
इस प्रकार भिक्षावृत्ति के कई कारण है ।इसलिए सभी भिक्षुओं को एक ही तराजू में तौलकर उनके लिए एक जैसी सहायता करना उचित भी नहीं है। आवश्यकता है तो भिक्षावृत्ति के मूल में जाकर उचित जानकारी लेना फिर समस्या के निवारण का प्रयास करना ।
हर वर्ष 'लोक सेवा आयोग' इतनी परीक्षाएं लेता है तथा विभिन्न विभागों में नियुक्तियां करता है। विचारणीय है, कि एक विशेष सेवा विभाग की स्थापना 'लोक सेवा आयोग 'अपने माध्यम से करे तो भिक्षावृत्ति की समस्या के निदान में काफी सहायता मिल सकती है ।एक नया "भिक्षावृत्ति उन्मूलन एवं पुनर्वास विभाग" इसके अंतर्गत प्रत्येक जिले/ शहर में अधिकारियों की नियुक्ति हो ।जिनके द्वारा निम्नलिखित कार्य किए जाएं -
क. अधिकारियों द्वारा फील्ड वर्क, अर्थात अपने-अपने क्षेत्र से भिक्षुकों से पूछताछ करके भिक्षा मांगने के मूल कारण की जानकारी लेना, तथा यथासंभव उसकी सहायता करना ।उनकी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे -भोजन ,वस्त्र, आवास की पूर्ति के साथ शिक्षा स्वास्थ्य तथा रोजगार की भी व्यवस्था हो सके, साथ ही उनमें यह जागरूकता लाना भी आवश्यक है ,कि क्यों भीख मांगना एक दंडनीय अपराध भी है।
ख. जबरन भीख मंगवाने वाले गिरोह पर सख्त कार्रवाई ,तथा बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना।
लेकिन इन कार्यों में हमें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है उनमें प्रमुख है,
- पैसा और मानव शक्ति बड़े पैमाने पर चाहिए।
- भ्रष्टाचार पर निगरानी की आवश्यकता होगी ,ऐसा ना हो कि जो धनराशि सरकार की ओर से भिक्षुकों की सहायता के लिए आए उनसे बिचौलिए अपना जेब भर लें।
- तीसरी और महत्वपूर्ण चुनौती है, जन- सामान्य की मानसिकता पर कार्य करना, उन्हें इस विचार के प्रति जागरूक करना कि भीख मांगना यदि गलत है तो भीख देना उससे भी बड़ी गलती है। इसलिए राह चलते यदि कोई भीख मांगते दिखे ,तो उसे भीख देने से बेहतर यथा शीघ्र आश्रय गृह को सूचित करना होगा। ताकि उस भिखारी के जीवन को एक नया और सकारात्मक मोड़ मिल सके।
एक विचारणीय बात यह भी है, की सरकार ,पुलिस ,तथा एन जी ओ तीनों अपने-अपने स्तर से भिक्षावृत्ति के उन्मूलन की ओर कार्य कर रहे हैं। यदि तीनों संगठित रूप से इस कार्य को करें, तो यह भी भिक्षावृत्ति की समस्या के निवारण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
ध्यान देने योग्य बात यह है, कि ना तो भिक्षुक को अपराधी मानना उचित है, और नहीं भिक्षावृत्ति को एक सामान्य घटना। बल्कि भिक्षावृत्ति हमारे देश की एक ऐसी समस्या है, जो हमारे देश की छवि खराब करती है ,तथा हमारे सामाजिक व्यवस्था पर ढेरों सवाल उठाती है। यदि भिक्षावृत्ति के मूल में जाकर उसका निदान न किया गया ,तो इसकी समाप्ति कल्पना तक सिमट कर रह जाएगी, तथा भिक्षावृत्ति हमारी सामाजिक- व्यवस्था के साथ-साथ हमारी भावनाओं तथा मानवता पर भी प्रश्न उठाती रहेगी।
लेखक - रचना मिश्रा पांडे

जनता से सवाल: क्या आप मानते हैं कि राह चलते भिक्षुकों को पैसे देना उनकी मदद करने के बजाय इस समस्या को और अधिक बढ़ावा देता है, और क्या हमें दान के बजाय उनके पुनर्वास की सूचना संबंधित विभागों को देनी चाहिए?











