श्रेष्ठ कौन....?
लेखक - रचना मिश्रा पांडे--:
थोड़ी कल्पना करें ,कोई हमें अपने घर ले जाए ,हमारे भोजन पानी और आराम का पूरा ध्यान रखें, परिवार का हर सदस्य बच्चा हो या बड़ा बस हमारा ध्यान रखने में व्यस्त हो। और जब हम पूर्णतः उन लोगों के बीच सहज हो जाए तो वह लोग हमें विधि- विधान के साथ झूमते गाते हुए निर्धारित स्थान पर ले जाकर जश्न के साथ हमारी हत्या करवा दे ।तो क्या हमारी आत्मा इस कुटिलता और विश्वासघात के लिए उन लोगों को कभी क्षमा कर पाएगी?
अब ज़रा ध्यान दें, हम पशुओं के साथ ऐसा ही करते हैं या नहीं ?अब हम एक ऐसी घटना की ओर देखते हैं, जो हमारे देश में धर्म के नाम पर बहुत सामान्य है। एक गाड़ी में सवार होकर करीब 6 -7 लोगों का परिवार किसी मंदिर की ओर जा रहे थे ।कोई तालियां, कोई घंटी, तो कोई ढोलक बजाकर माता जी के जय- जयकार कर रहा था। सभी प्रसन्न थे ,सबके चेहरे खिले हुए थे ।मात्र एक प्राणी जो सहमा हुआ था बस इधर-उधर देख रहा था वह एक बकरा था ,जिसे वो लोग बलि चढ़ाने के लिए ले जा रहे थे ।उन लोगों ने उसे बकरे को बांध रखा था। वह लोग मंदिर पहुंचे, फिर एक निश्चित स्थान पर बकरे को ले जाकर और कस कर बांध दिया ।बकरा भागने की नाकामयाब कोशिश करता रहा, लेकिन ढोलक ,घंटी की आवाज तथा माताजी के जय -जयकार के साथ बकरे की बलि चढ़ा दी गई।
सवाल यह उठता है, कि क्या माताजी इस दर्दनाक घटना से प्रसन्न हुई होगी?
थोड़ा विचार करें ,जब हम बकरे को खरीद कर घर लाते हैं, तो कुछ दिनों तक उसके भोजन -पानी का बहुत ध्यान रखते हैं ।उसे समय-समय पर दुलारते ,पुचकारते हैं, हमारे बच्चे उसके साथ खेलते भी हैं ।और जब वह हमारे बीच सहज हो जाता है ,तब हम पूजा- पाठ तथा रीति- रिवाज के नाम पर उसकी हत्या करवा देते हैं। आखिर इस कुटिलता और विश्वासघात के लिए कौन से देवी देवता हमें झोली भरकर आशीष देते होंगे?
सवाल यह है, कि धर्म हमें क्या सिखलाता है, दया या क्रूरता? जिस ईश्वर की छवि हमने परम दयालु, कृपालु ,दुखहर्ता ,सुखकरता के रूप में मन में बसा रखी है, उसके समक्ष हमें कैसा हृदय लेकर जाना चाहिए ,कुटिल या कोमल? सरल या कठोर ?दयालू या क्रूर ?
बलि प्रथा हमारे कैसे मानसिकता को दर्शाता है कोमल, सरल ,दयालू? या फिर कुटिल ,कठोर, तथा क्रूर ? स्वयं तय करें।
बच्चों में पशुओं को लेकर काफी उत्सुकता होती है ।हम सब ने भी बचपन में जानवरों से संबंधित कार्यक्रम देखे होंगे। और सब ने एक बात पर ध्यान अवश्य दिया होगा, कि जानवर अधिकांश झुंड में रहना पसंद करते हैं ।अतः झुंड में उनमें से कोई भी यदि चोटिल हो, तो बाकी अपनी चाल धीमी कर लेते हैं ।या अपने उस चोटिल साथी को बीच में रखकर चलाते हैं ,ताकि उसे चलने में अधिक परेशानी ना हो। या फिर कोई एक पीछे रह जाए ,तो बाकी पशु उसे बार-बार पीछे मुड़कर देखते रहते हैं ।अर्थात पशुओं में संवेदनशीलता तथा साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति होती है, जो इंसानों में नहीं मिलती। अर्थात् पशुओं का अपने साथी पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान रहता है। और हम इंसानों ने यह कभी नहीं सोचा ,कि हमने जिस पशु की बलि चढ़ा दी, उसके साथियों को भी एक गहरी भावनात्मक पीड़ा में डाल दिया ।पशुओं में इतनी समझ तो नहीं होती, कि वह अपने साथी को कहां ढूंढे? कैसे ढूंढे? उनके पास रह जाती है, तो बस गहरी वेदना। अपने इसी संवेदनशीलता के कारण बहुत सारे पशु मिलकर एक समूह बना लेते हैं। और हम इंसान जहां भारी मात्रा में इकट्ठे हो जाएं वहांँ भीड़ कहलाती है। क्योंकि यहांँ संवेदनशीलता का अभाव होता है ।पशु समूह में रहकर साथ होते हैं, और हम इंसान भीड़ में रहकर अकेले। सवाल यह है, कि बेहतर क्या है- भीड़ या समूह?
पहले मैं जहां रहती थी, वहांँ पड़ोस में एक संपन्न परिवार था। वहां शादी -ब्याह हो ,बच्चे का जन्म हो या कोई भी शुभ कार्य वहां बकरे की बलि चढ़ाई जाती थी। बलि चढ़ाना वहां शुभ माना जाता था ।लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आया, कि किसी को पीड़ा पहुंँचाकर उसकी जान ले लेना शुभ कैसे हो सकता है?
मैं किसी की धार्मिक भावना को आहत नहीं करना चाहती, किंतु बलि प्रथा जैसी घटना हमारे बीच एक प्रश्न अवश्य खड़ा कर देती है ।कि कहते हैं कि इंसान ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है ,किंतु यह बलि- प्रथा किसे श्रेष्ठ प्रमाणित कर देती है -हम इंसानों को जिन्होंने माया- ममता खोकर बड़े विधि- विधान के साथ एक बेजुबान की हत्या करवा दी? या उन पशुओं को जिन्होंने इतनी कठोरता ,कुटिलता ,पीड़ा विश्वास- घात सब कुछ सहते हुए अपने प्राण गंवा दिए और मरते-मरते भी हमें आहार दे गया??
क्या हमें यह विचार नहीं करना चाहिए ,कि इस स्थान पर पहुंचकर श्रेष्ठ कौन हो जाता है- हम इंसान या वह पशु?
लेखक - रचना मिश्रा पांडे

अंतिम सवाल
यदि करुणा, संवेदनशीलता और विश्वास ही धर्म की कसौटी हैं, तो इस कसौटी पर आज वास्तव में कौन खरा उतर रहा है—हम इंसान या वह बेज़ुबान पशु?











