हम सभी के पास एक ऐसा दोस्त होता है (या शायद हम खुद वो दोस्त हैं), जो दो पेग अंदर जाते ही दार्शनिक बन जाता है या अपने 'Ex' को फोन करके रोने लगता है। सुबह उठकर कॉल लॉग देखकर होने वाला वो पछतावा जिसे 'Hangxiety' कहा जाता है, बहुत भारी होता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? क्या शराब वाकई सच बोलती है या यह सिर्फ दिमाग का एक भ्रम है? आइए, अल्कोहल मायोपिया से लेकर प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स तक के सफर को विस्तार से समझते हैं।
1. दिमाग का 'ब्रेक' फेल होना: प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स की भूमिका
हमारे मस्तिष्क का सामने वाला हिस्सा, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) कहा जाता है, हमारे शरीर के 'कंट्रोल रूम' की तरह काम करता है। इसका काम है:
- सही और गलत का फैसला करना।
- सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करना।
- नतीजों के बारे में सोचना (Impulse Control)।
जब शराब रक्त के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुंचती है, तो वह सबसे पहले इसी हिस्से को सुस्त कर देती है। सरल भाषा में कहें तो, आपके दिमाग का 'ब्रेक' फेल हो जाता है। जो बातें आप होश में "लोग क्या कहेंगे" सोचकर दबा लेते हैं, शराब उन फिल्टरों को हटा देती है।
2. 'अल्कोहल मायोपिया': जब भविष्य धुंधला हो जाता है
मनोविज्ञान में एक शब्द है—अल्कोहल मायोपिया (Alcohol Myopia)। इसका मतलब है 'शराब वाली निकटदृष्टि'। नशे की हालत में व्यक्ति की दूरदर्शिता खत्म हो जाती है।
- आप यह नहीं सोच पाते कि इस कॉल से कल कितनी शर्मिंदगी होगी।
- आपका ध्यान केवल 'वर्तमान' की तीव्र भावना पर केंद्रित हो जाता है।
- अगर उस पल आपको अकेलेपन का अहसास हो रहा है, तो आपका दिमाग केवल उसी भावना को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाएगा।
3. डोपामाइन का 'कॉन्फिडेंस' और दबी हुई भावनाएं
शराब पीते ही दिमाग में डोपामाइन (Dopamine) का स्तर बढ़ जाता है, जिसे 'फील गुड' हार्मोन कहते हैं। यह आपको एक छद्म आत्मविश्वास (False Confidence) देता है। आपको लगता है कि:
- "आज तो मैं उसे सब सच बता दूंगा/दूंगी।"
- "मेरा फोन उठा लिया जाएगा और सब ठीक हो जाएगा।" यह आत्मविश्वास अक्सर गलत फैसलों की ओर ले जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि शराब कोई नई भावना पैदा नहीं करती, बल्कि आपके भीतर पहले से दबी हुई भावनाओं को 'वॉल्यूम' बढ़ा देती है।
4. अकेलापन और 'लिक्विड करेज' (Liquid Courage)
रात का समय अक्सर शांति और एकांत का होता है। दिन भर की भागदौड़ के बाद जब इंसान शराब के साथ बैठता है, तो उसका सामाजिक डर (Social Anxiety) कम हो जाता है। इसे ही 'लिक्विड करेज' कहा जाता है। जो बात कहने की हिम्मत साधारण स्थिति में नहीं होती, वह नशे में आसान लगने लगती है।
ड्रंक कॉलिंग और टेक्स्टिंग से कैसे बचें? (प्रो टिप्स)
यदि आप भी इस 'इमोशनल ड्रामा' से थक चुके हैं, तो ये तरीके अपनाएं:
- 'ड्रंक मोड' ऐप्स का उपयोग करें: प्ले स्टोर पर ऐसे कई ऐप्स मौजूद हैं जो आपके फोन के कुछ कॉन्टैक्ट्स को कुछ घंटों के लिए लॉक कर देते हैं।
- फोन दोस्त को सौंप दें: अगर आप बाहर पार्टी कर रहे हैं, तो अपना फोन किसी ऐसे भरोसेमंद दोस्त को दें जो खुद न पी रहा हो।
- वाई-फाई और डेटा बंद करें: अक्सर इंटरनेट बंद होने से मैसेज भेजने की प्रक्रिया में आने वाली बाधा आपको दोबारा सोचने का मौका दे देती है।
- नंबर डिलीट या नाम बदलें: अगर कोई खास नंबर आपको बार-बार परेशान करता है, तो उसका नाम 'Do Not Call' या 'Pachhtawa' (पछतावा) के नाम से सेव करें।
क्या शराब में बोला गया सच 'असली' होता है?
एक पुरानी लैटिन कहावत है—"In Vino Veritas" (शराब में सच होता है)। लेकिन मनोवैज्ञानिक इसे पूरी तरह सही नहीं मानते। शराब में बोला गया सच अधूरा हो सकता है। यह सच तो होता है, लेकिन बिना किसी तर्क, मर्यादा या संदर्भ (Context) के होता है। इसलिए, नशे में किए गए वादों या दावों पर पूरी तरह भरोसा करना गलत हो सकता है।
'ड्रंक कॉलिंग' केवल एक गलती नहीं, बल्कि हमारे दिमाग के जटिल रसायनों का खेल है। अगली बार जब आप ग्लास उठाएं, तो याद रखें कि आपका 'प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' छुट्टी पर जा रहा है। अपने फोन को सुरक्षित दूरी पर रखना ही सबसे बड़ी समझदारी है।
NOTE - यह लेख इंटरनेट पर उपलब्ध रिपोर्ट्स और जानकारी पर आधारित है. Nbharat24 News इसकी किसी भी तरह से जिम्मेदारी नहीं लेता.
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है? हमें कमेंट में बताएं और इस जानकारी को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अक्सर 'इमोशनल कॉल' करते हैं!









