लेखक - रचना मिश्रा पांडे
जश्न या अव्यवस्था?
कुछ दिनों पहले एक बुजुर्ग महिला से मेरी बात हो रही थी। कुछ कहते-कहते उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने जो बताया वह सुनकर मेरी धड़कनें अधीर होकर धड़कने लगीं और मन में कई सवाल उत्पन्न होने लगे।
उन्होंने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व उनके 6 माह के पोते की तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिवार वाले जल्दी-जल्दी में अपनी गाड़ी में बच्चे को लेकर अस्पताल की तरफ भागे। बच्चा अपनी दादी की गोद में था, लेकिन बीच रास्ते में किसी की बारात निकल रही थी, बैंड-बाजा बज रहा था और लोग नाच रहे थे तथा जश्न मना रहे थे।
बच्चे की हालत देखकर उसका पिता गाड़ी से निकलकर अगली गाड़ी में बैठे दूल्हे और साथियों को समझाने गया कि “बारात थोड़ा जल्दी निकाले, बच्चे की तबीयत बहुत खराब है।” लेकिन बैंड-बाजा और जश्न के बीच पिता की आवाज दब गई। समझाते-बुझाते काफी देर हो गई और बच्चा दादी की गोद में ही मृत्यु को प्राप्त हो गया।
यह बताते हुए बुजुर्ग महिला ने भारी मन से कहा कि “बारात तो बस बहाना बन गया, बच्चे का जाना ही ईश्वर की मर्जी थी।” उन्होंने तो यह कहकर अपने मन को मना लिया, किंतु मेरे मन में यह सवाल बार-बार उठता रहा कि क्या सचमुच यह मात्र ईश्वर की मर्जी थी या फिर किसी बड़ी अव्यवस्था की देन?
सड़क किसी की निजी संपत्ति तो नहीं है। क्या जश्न मनाने के लिए कोई निश्चित स्थान नहीं होना चाहिए, ताकि ऐसी घटनाएं बंद हो सकें?
सड़क पर नाचना, जुलूस निकालना—चाहे वह रीति-रिवाज के नाम पर हो या धर्म के नाम पर—यह हमारे देश का एक आम दृश्य है, जो एक बड़ी अव्यवस्था को दर्शाता है। अक्सर देखा जाता है कि शादी-ब्याह हो या कोई भी धार्मिक आयोजन या किसी भी प्रकार का उत्सव, वहां लोग दूसरों की सुविधा का ध्यान बिल्कुल भी नहीं रखते।
कहीं भी खुले मैदान में रात भर डीजे और भारी बेस का शोर जन सामान्य को प्रभावित करता है। भारी बेस के कारण आसपास के घरों में कंपन तक होता रहता है, जिससे आसपास के घरों में हार्ट पेशेंट, बुजुर्ग और बच्चे प्रभावित होते हैं। यहां सिर्फ असुविधा नहीं है, जान का सवाल है।
क्या हमारी स्वतंत्रता की कोई सीमा निश्चित नहीं होनी चाहिए, जिससे हमारी स्वतंत्रता दूसरों की तकलीफ का कारण न बन जाए?
भारत में रीति-रिवाज और धर्म तथा परंपरा के नाम पर सब कुछ चलता है, यहां तक कि पुलिस/प्रशासन भी धर्म तथा परंपरा के नाम पर समझौते कर लेता है। तो सवाल यह उठता है कि जहां हमारा संविधान भी लचीला है तथा आवश्यकता के अनुसार समय-समय पर उसमें संशोधन होते रहते हैं, तो धर्म और रीति-रिवाज के नाम पर हम इतने कट्टर क्यों हो जाते हैं?
ध्वनि प्रदूषण के लिए कानून बनने के बावजूद कड़ाई से पालन क्यों नहीं होता? और आम आदमी की परेशानी को गंभीरता से क्यों नहीं लिया जाता?
यदि हम तुलनात्मक दृष्टि से देखें, तो इस संबंध में विदेश में जैसे अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया आदि में नियम-कानून हमसे बेहतर हैं, जिसे हमें अपनाने का प्रयास करना चाहिए—
- जहां सड़कों पर डीजे नामुमकिन है।
- ध्वनि प्रदूषण को लेकर कानून बहुत सख्त है।
- बेस पर विशेष ध्यान दिया जाता है क्योंकि वह दीवारों को पार कर जाता है।
- शादियां अधिकांश बंद हाल में तथा ध्वनिरोधी स्थान पर ही होती हैं।
- रिहायशी इलाकों में शोर पर पूर्णतः रोक है।
- यदि सामान्य व्यक्ति भी इस संबंध में शिकायत करें तो उस पर पुलिस तुरंत कार्रवाई करती है।
हमें भी इन नियमों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए, जहां मुख्य सोच हो—
“तुम्हारा उत्सव किसी की शांति भंग नहीं कर सकता।”
आवश्यक यह है कि भारत में भी ऐसे नियमों को व्यवहार में उतारा जाए, बात सिर्फ कहने तक सीमित न रह जाए—
- शोर प्रदूषण पर जीरो टॉलरेंस।
- आम नागरिक बिना डर के शिकायत कर सके और प्रशासन तुरंत कार्रवाई करे।
- रिहायशी इलाकों में शोर पर पूर्णतः रोक।
- जश्न मनाने के लिए एक निश्चित स्थान हो।
सवाल यह भी है कि जब शहरों में सामुदायिक भवन, ध्वनि नियंत्रण स्थान और मैरिज हॉल उपलब्ध हैं, तो सड़कों पर जश्न मनाना कहां तक उचित है, जो जन सामान्य की तकलीफ का कारण बन जाए?
थोड़ा विचार करें—जहां बारात के कारण बच्चे को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका, जहां हार्ट पेशेंट, बुजुर्गों और बच्चों को भारी बेस की आवाज गंभीर तकलीफ दे रही हो—वहां जश्न दिख रहा है या अव्यवस्था?
इस संबंध में प्रशासन की कड़ाई के साथ लोगों में भी यह जागरूकता होनी चाहिए कि हमारे होठों की हंसी औरों की आंखों के आंसू का कारण न बने।
चिंताजनक बात यह है कि यदि व्यवस्था बदलने की ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो घटनाएं बार-बार स्वयं को दोहराएंगी।
लेखक - रचना मिश्रा पांडे










