रिपोर्ट - रांची न्यूज़ डेस्क
झारखंड में पेसा नियमावली को लेकर एक अजीब और दिलचस्प स्थिति बन गई है। आदिवासी समाज के लिए बेहद अहम यह नियमावली अब कोर्ट और सरकार दोनों के बीच फंसती नजर आ रही है। 23 दिसंबर को चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की बेंच में इस नियमावली से जुड़ी अवमानना याचिका पर सुनवाई होनी है।
पिछली सुनवाई में अदालत ने विभागीय सचिव मनोज कुमार को साफ निर्देश दिया था कि 23 दिसंबर तक नियमावली को लागू करने का स्पष्ट टाइम फ्रेम तय करें। लेकिन अब जो मोड़ आया है, वह वाकई रोचक है। उसी दिन राज्य सरकार ने 3 बजे से कैबिनेट की बैठक भी बुला रखी है। इस बैठक में पेसा नियमावली पर फिर से चर्चा होने और उसे पास करने की संभावना भी जताई जा रही है।
यानी, हाईकोर्ट में सुनवाई समाप्त होने तक कोर्ट अपना आदेश सुना चुका होगा, लेकिन इसके बाद यह रहस्य बना रहेगा कि कैबिनेट की बैठक में नियमावली को मंजूरी मिलेगी या नहीं। यह स्थिति न केवल सरकार और अदालत के लिए चुनौतीपूर्ण है, बल्कि आदिवासी समाज के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।
मालूम हो कि आदिवासी बुद्धिजीवी मंच ने पेसा नियमावली को लागू कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने 13 महीने पहले ही नियमावली को लागू करने का आदेश दिया था। लेकिन अब तक नियमावली लागू नहीं हो पाई है। यही कारण है कि अब अवमानना याचिका पर सुनवाई की जा रही है।
विशेष बातें जो इस स्थिति को और दिलचस्प बनाती हैं:
- कोर्ट ने नियमावली लागू करने का आदेश 13 महीने पहले ही दिया था, लेकिन सरकार ने इसे लागू नहीं किया।
- 23 दिसंबर को हाईकोर्ट में सुनवाई और कैबिनेट की बैठक दोनों एक ही दिन हैं, जिससे निर्णय की गुत्थी और जटिल हो गई है।
- आदिवासी समाज के लिए यह नियमावली अधिकारों की सुरक्षा का बड़ा मुद्दा है।
- अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत और सरकार के फैसले में संतुलन कैसे बिठाया जाएगा।
निष्कर्ष:
पेसा नियमावली सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा का प्रतीक है। 23 दिसंबर को हाईकोर्ट और कैबिनेट की कार्रवाई दोनों की निगाहें पूरे राज्य की आदिवासी जनता पर टिकी रहेंगी।









