अटल-नीतीश की कहानी: सात दिन का सीएम, जीवन भर का भरोसा और बिहार के विकास की गाथा
भारतीय राजनीति में रिश्तों के समीकरण अक्सर सत्ता के गलियारों में बनते और बिगड़ते रहते हैं। लेकिन इस शोर-शराबे के बीच एक रिश्ता ऐसा रहा, जिसने दशकों तक अपनी गरिमा बनाए रखी—वह रिश्ता था भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का। नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई बार गठबंधन बदले, पाले बदले, लेकिन अटल जी के प्रति उनकी निष्ठा कभी नहीं बदली।
1. 1990 का दशक: जब नीतीश बने अटल के 'खास'
90 के दशक में जब देश की राजनीति मंडल और कमंडल के बीच झूल रही थी, तब नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर 'समता पार्टी' बनाई। 1996 में बीजेपी और समता पार्टी का गठबंधन हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली नजर में ही नीतीश की प्रशासनिक पकड़ और सादगी को पहचान लिया था। यही कारण था कि 1998 और 1999 की अटल सरकारों में नीतीश कुमार को रेलवे, कृषि और भूतल परिवहन जैसे भारी-भरकम मंत्रालय सौंपे गए।
2. वह ऐतिहासिक 7 दिन: जब अटल ने दिया 'धैर्य' का मंत्र
साल 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। राज्यपाल ने नीतीश कुमार को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।
- 3 मार्च 2000: नीतीश ने पहली बार सीएम पद की शपथ ली।
- अटल का अटूट साथ: दिल्ली में अटल सरकार नीतीश के पीछे चट्टान की तरह खड़ी थी।
- त्याग का फैसला: बहुमत का आंकड़ा न जुटने पर नीतीश ने सदन में वोटिंग से पहले ही इस्तीफा दे दिया।
उस समय नीतीश हताश थे, लेकिन अटल जी ने उन्हें समझाया कि यह अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। ठीक 5 साल बाद 2005 में नीतीश भारी बहुमत से लौटे और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
3. बिहार की बदलती तस्वीर: अटल-नीतीश के 'ड्रीम प्रोजेक्ट्स'
अटल बिहारी वाजपेयी का मानना था कि भारत के विकास का रास्ता बिहार और यूपी की गलियों से होकर गुजरता है। नीतीश कुमार ने रेल मंत्री रहते हुए बिहार के लिए वह सब मांगा जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी।
रेलवे का कायाकल्प
- पूर्व मध्य रेल (ECR), हाजीपुर: बिहार को अपना पहला रेलवे मुख्यालय मिला, जिससे राज्य में रेल नेटवर्क का विस्तार तेज हुआ।
- गंगा पर महासेतु (पटना और मुंगेर): उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाले ये पुल अटल-नीतीश युग की सबसे बड़ी देन हैं।
- कोसी महासेतु: 86 साल के लंबे इंतजार के बाद 2003 में अटल जी ने इस पुल का शिलान्यास किया, जिसने मिथिलांचल की दूरी को कम कर दिया।
- रेलवे कारखाने: हरनौत में कोच रिपेयर वर्कशॉप और मधेपुरा-छपरा के कारखानों की नींव इसी कालखंड में पड़ी।
सड़कों का जाल
अटल जी की 'स्वर्णिम चतुर्भुज योजना' और 'प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना' को बिहार के गांवों तक पहुंचाने के लिए नीतीश कुमार ने पूरी ताकत झोंक दी। आज बिहार की सड़कों का जो सुधरा हुआ रूप दिखता है, उसकी पटकथा उसी दौर में लिखी गई थी।
4. गठबंधन की उठापटक और 'अटल' प्रेम
नीतीश कुमार के राजनीतिक फैसलों पर अक्सर सवाल उठते हैं। उन्होंने 2013 में NDA का साथ छोड़ा, 2017 में वापसी की, फिर 2022 में अलग हुए और 2024 में पुनः वापस आए। आलोचकों ने उन्हें 'पलटूराम' कहा, लेकिन नीतीश ने हर बार एक ही बात दोहराई: "अटल-आडवाणी के दौर वाली बीजेपी और थी।" जब अटल जी का निधन हुआ, तो नीतीश कुमार ने छोटे भाई की तरह शोक मनाया। उन्होंने न केवल बिहार में अटल जी की विशाल प्रतिमा लगवाई, बल्कि उनके नाम पर कई जनकल्याणकारी योजनाएं भी शुरू कीं। वह आज भी कहते हैं, "हम राजनीति में जो कुछ भी हैं, अटल जी की कृपा से हैं।"
5. आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: एक रिपोर्ट
अटल-नीतीश युग में शुरू हुए प्रोजेक्ट्स का असर आज बिहार की जीडीपी पर साफ दिखता है:
- कनेक्टिविटी: गंगा और कोसी पर बने पुलों ने व्यापारिक लागत को 30% तक कम कर दिया।
- रोजगार: हाजीपुर मुख्यालय और रेल कारखानों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार मिला।
- कृषि: अटल जी के समय शुरू हुई सिंचाई योजनाओं और सड़क नेटवर्क ने किसानों को सीधे बाजार से जोड़ दिया।
निष्कर्ष
सत्ता बदली, विचारधाराएं बदलीं और बिहार की राजनीति के कई चेहरे बदल गए। लेकिन नीतीश कुमार के लिए अटल बिहारी वाजपेयी एक 'मार्गदर्शक' के रूप में हमेशा जीवित रहे। यह कहानी केवल राजनीति की नहीं, बल्कि उस भरोसे (Trust) की है जो सात दिन की नाकामी से शुरू होकर जीवन भर के सम्मान में तब्दील हो गई।
अटल की 'पाठशाला' और नीतीश का 'सुशासन': वह गवर्नेंस मॉडल जिसने बिहार को बदला
जब 2005 में नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संभाली, तो राज्य 'जंगलराज' के ठप्पे और प्रशासनिक विफलता से जूझ रहा था। नीतीश के पास चुनौती बड़ी थी, लेकिन उनके पास अटल बिहारी वाजपेयी के साथ केंद्र में काम करने का लंबा अनुभव था। नीतीश कुमार ने अटल जी की कार्यशैली से तीन मुख्य मंत्र सीखे थे: समावेशी विकास (Inclusivity), बुनियादी ढांचे पर जोर (Infrastructure), और गठबंधन का अनुशासन (Coalition Dharma)।
यहाँ उन प्रमुख 'सुशासन' मॉडलों का विवरण है जो नीतीश ने अटल जी की प्रेरणा से बिहार में लागू किए:
1. 'न्याय के साथ विकास': अटल के सर्वसमावेशी विजन का विस्तार
अटल जी अक्सर कहते थे कि विकास की किरण अंतिम व्यक्ति तक पहुँचनी चाहिए। नीतीश कुमार ने इसी को 'न्याय के साथ विकास' का नाम दिया।
- अति पिछड़ा और महादलित वर्ग: अटल जी के 'अंत्योदय' विचार को अपनाते हुए नीतीश ने बिहार में 'महादलित' और 'अति पिछड़ा' (EBC) आयोग बनाया, ताकि हाशिए पर खड़े लोगों को मुख्यधारा में लाया जा सके।
- महिला सशक्तिकरण: पंचायत चुनावों में महिलाओं को 50% आरक्षण देने का क्रांतिकारी फैसला अटल जी के उस सपने का हिस्सा था जिसमें वे आधी आबादी को शासन में देखना चाहते थे।
2. इंफ्रास्ट्रक्चर ही विकास की कुंजी है
नीतीश कुमार ने देखा था कि कैसे अटल जी ने 'स्वर्णिम चतुर्भुज' और 'प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना' के जरिए देश की धमनियों को जोड़ा था।
- सड़क और पुल: बिहार का मुख्यमंत्री बनते ही नीतीश ने सड़कों के लिए अलग से भारी बजट आवंटित किया। उनका लक्ष्य था कि "बिहार के किसी भी कोने से पटना 6 घंटे में पहुँचा जा सके।"
- बिजली सुधार: अटल जी ने देश में बिजली सुधारों की नींव रखी थी, नीतीश ने बिहार में उसे मिशन मोड में लिया। 2005 में जहाँ बिहार में बिजली एक सपना थी, आज वह हर गांव तक उपलब्ध है।
3. कानून का राज (Rule of Law)
अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में संस्थाओं की मजबूती पर जोर रहता था। नीतीश ने बिहार में पुलिस प्रशासन को राजनीति से अलग कर 'कानून का राज' स्थापित करने की कोशिश की।
- स्पीडी ट्रायल: बाहुबलियों और अपराधियों को सजा दिलाने के लिए नीतीश ने 'स्पीडी ट्रायल' का मॉडल अपनाया, जो अटल जी के 'त्वरित न्याय' के विचार से प्रेरित था।
4. गठबंधन धर्म और राजनीतिक गरिमा
अटल जी को 'गठबंधन राजनीति का पितामह' कहा जाता है। नीतीश कुमार ने अटल जी से सीखा कि अलग-अलग विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर सरकार कैसे चलाई जाती है।
- विवादित मुद्दों से दूरी: जिस तरह अटल जी ने एनडीए चलाते समय विवादित मुद्दों को किनारे रख 'कॉमन मिनिमम प्रोग्राम' पर ध्यान दिया, नीतीश ने भी बिहार में भाजपा के साथ रहते हुए राज्य के विकास को प्राथमिकता दी।
5. कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
नीतीश कुमार जब अटल सरकार में कृषि मंत्री थे, तब उन्होंने 'किसान क्रेडिट कार्ड' जैसी योजनाओं के महत्व को समझा था। बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने 'कृषि रोडमैप' तैयार किया, जिसने राज्य के किसानों की आय बढ़ाने में मदद की।
📊 सुशासन का परिणाम: एक नजर में
क्षेत्र | 2005 से पहले की स्थिति | नीतीश-अटल मॉडल का प्रभाव |
सड़कें | जर्जर और न के बराबर | गांव-गांव तक पक्की सड़कों का जाल |
शिक्षा | स्कूलों से बच्चों का पलायन | साइकिल और पोशाक योजना से साक्षरता में वृद्धि |
प्रशासन | नौकरशाही पर राजनीतिक दबाव | प्रशासनिक मजबूती और जवाबदेही |
स्वास्थ्य | पीएचसी (PHC) में सन्नाटा | सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भारी उपस्थिति |
निष्कर्ष: एक विरासत जो आज भी जारी है
नीतीश कुमार का 'सुशासन बाबू' कहलाना कोई इत्तेफाक नहीं है। यह उस ट्रेनिंग का नतीजा है जो उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के 'मंत्रिमंडल रूपी स्कूल' में ली थी। नीतीश ने अटल जी के 'नेशन फर्स्ट' के विचार को 'बिहार फर्स्ट' के सांचे में ढाला। सत्ता के समीकरण भले बदलते रहे, लेकिन गवर्नेंस के जो मानक अटल-नीतीश युग में तय हुए, वे आज भी बिहार की प्रगति का आधार हैं।








