ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश: साल 2015 का वह मंजर आज भी लोगों के जेहन में सिहरन पैदा कर देता है, जब भीड़ ने अफवाहों के आधार पर एक इंसान की जान ले ली थी। दादरी का बिसाड़ा गांव एक बार फिर सुर्खियों में है। वजह है— 23 दिसंबर 2025 को आया कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला, जिसने उत्तर प्रदेश सरकार की उस मंशा पर पानी फेर दिया है, जिसमें इस मुकदमे को वापस लेने की मांग की गई थी।
मुख्य बिंदु (Quick Highlights):
- कोर्ट का फैसला: सूरजपुर कोर्ट ने मुकदमा वापस लेने की सरकारी याचिका को किया खारिज।
- सरकार का तर्क: सांप्रदायिक सौहार्द का हवाला देकर केस बंद करना चाहती थी सरकार।
- पीड़ित परिवार का रुख: अखलाक की पत्नी इकरामन ने केस वापसी को बताया 'कानून का दुरुपयोग'।
- अगली सुनवाई: अब सबकी नजरें 5 जनवरी को होने वाली हाईकोर्ट की कार्यवाही पर टिकी हैं।
28 सितंबर 2015 की वो काली रात: क्या हुआ था बिसाड़ा में?
घटना की शुरुआत एक मंदिर से हुई घोषणा के बाद फैली 'गौकशी की अफवाह' से हुई थी। आरोप था कि मोहम्मद अखलाक के घर में गोमांस रखा गया है। देखते ही देखते उत्तेजित भीड़ ने अखलाक के घर पर हमला बोल दिया।
- अखलाक को घर से घसीटकर बाहर निकाला गया।
- ईंटों और डंडों से पीट-पीटकर उनकी निर्मम हत्या कर दी गई।
- उनके बेटे दानिश को अधमरा कर दिया गया। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत में 'मॉब लिंचिंग' और 'असहिष्णुता' पर एक बड़ी बहस छेड़ दी थी।
कानूनी पेचीदगियां और 10 साल का लंबा इंतजार
इस मामले में पुलिस ने कुल 18 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।
- सुनवाई में देरी: 2015 की घटना का ट्रायल फरवरी 2021 में शुरू हो सका।
- आरोपियों की स्थिति: 18 आरोपियों में से 2 की मौत हो चुकी है, जबकि बाकी सभी फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।
- सरकार की दलील: पिछले महीने सरकारी वकील ने तर्क दिया कि चूंकि दोनों पक्षों में पुरानी रंजिश नहीं थी और किसी हथियार (बंदूक) का इस्तेमाल नहीं हुआ, इसलिए भाईचारे के लिए केस वापस लिया जाए।
कोर्ट की फटकार: "आधारहीन है सरकार की अर्जी"
मंगलवार, 23 दिसंबर 2025 को सूरजपुर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सरकार की याचिका को 'निरस्त' कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि हत्या जैसे जघन्य अपराध में केस वापस लेने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। कोर्ट ने इसे 'महत्वहीन' करार देते हुए ट्रायल जारी रखने का आदेश दिया है।
इकरामन की लड़ाई: "यह न्याय की हत्या होगी"
अखलाक की पत्नी इकरामन ने हार नहीं मानी है। उन्होंने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट में अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि सरकार का यह कदम अपराधियों को बढ़ावा देने जैसा है। उनकी याचिका में स्पष्ट कहा गया है कि हत्या के मामले में समझौता या केस वापसी भविष्य के लिए एक गलत मिसाल (Precedent) पेश करेगी।
निष्कर्ष: 5 जनवरी पर टिकी हैं निगाहें
बिसाड़ा कांड महज एक हत्याकांड नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की साख का सवाल बन चुका है। एक तरफ सरकार 'सौहार्द' की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ एक परिवार 10 साल से इंसाफ की गुहार लगा रहा है।
अगला मोड़: अब 5 जनवरी को हाईकोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। क्या अखलाक के परिवार को इंसाफ मिलेगा या राजनीति की भेंट चढ़ जाएगा यह चर्चित मामला?









